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प्रेस विज्ञप्ति:कविताओं का रास्ता दुनिया की तरफ खुलता है

चित्तौड़गढ़ 24 जून 2015

एक से बढ़कर एक कविताओं ने एक बार फिर तय कर दिया कि समाज में रचनाकार अपनी दृष्टि से संसार को देखता है और फिर गंभीर सोच के साथ एक खुली अभिव्यक्ति देता है। यथार्थ को उतनी ही बेबाकी से परोसता हुआ कलमकार एक बेहतर समाज का सपना संजोता है। अभिव्यक्ति के लिहाज से लगातार कम होते स्पेस के बीच ऐसा खुला रचनापाठ और अनौपचारिक आयोजन हमारे बीच संवाद के रास्ते खोलता अनुभव हुआ।ग्लोबलाइजेशन के इस युग में मानवीय रिश्तेदारियां और स्त्री जीवन की गाथा ख़ास विषय रहे है उसी को केन्द्रित करते हुए कवियों ने खूब अच्छा पढ़ा। लगा कि कवितायेँ हमें दुनिया को देखने की नज़र देती है। आम आदमी के संघर्षप्रधान जीवन और जीवनगत आयामों को उकेरते हुए गीतों ने सभी का मन उद्वेलित कर दिया।मुक्त-छंद कविताओं के साथ ही लयबद्ध गीतों की यह शाम चित्तौड़गढ़ की साहित्यिक बिरादरी के लिए यादगार बन पड़ी


चित्तौड़गढ़ की साहित्यिक संस्था अपनी माटी और अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन के साझा आयोजन के रूप में तेईस जून को एक कविता केन्द्रित आयोजन दुर्ग चित्तौड़ के रतन सिंह महल के पास हुआ। किले में कविता-2 शीर्षक वाली इस संगोष्ठी में सबसे पहले पत्रकारिता के साथ दिगंतर और अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन जैसे गैर सरकारी संगठन में सालों से सेवारत युवा कवयित्री देवयानी भारद्वाज ने पाठ किया। सुनायी गयी दर्जनभर कविताओं का मूल स्वर स्त्री के लिए ज़माना और जीवन की कठिन डगर के आसपास ही रहा। यहाँ से देखो,  इच्छा नदी के पुल पर खड़ी स्त्री, बदनाम लड़कियां, रिक्त स्थानों की पूर्ती और मेरे घर की औरतें जैसी लम्बी कविता ने श्रोताओं को सोचने के स्तर पर झकझोर दिया। विकास के आंकड़े झुठलाती इन कविताओं में रचनाकार का व्यापक अवलोकन महसूस हुआ। फिर मूल रूप से गोरखपुर के युवा कवि बिपिन कुमार पाण्डेय ने कुछ छोटी-छोटी कवितायेँ सुनायी। समाज और व्यवस्था पर व्यंग्यात्मक स्वर में बिपिन ने पढ़ा तो ज्यादा सराहना मिली। दलाल परम्परा और भ्रष्टाचार पर तीखे व्यंग्यों ने संगोष्ठी को अपने तरीके से उंचाइयां दी। 

आयोजन के केंद्र में स्थित राष्ट्रीय स्तर की प्रसिद्धिप्राप्त गीतकार रमेश शर्मा ने चार गीत सुनाएं तो समूह रोमांचित हो उठा। मधुर गलाकारी के साथ गीतों में आयी सरल शब्दावली का अपना आकर्षण रहा। क्या लिखते रहते हो यूं ही, यहाँ रहना है पचास साठ सत्तर तक, कहो कैसी हो तुम, मैं तब से जानता हूँ गीतों की प्रस्तुति में ही संगोष्ठी जी उठी। लगा कि इस दौर के मुश्किल समय में लिखने-पढ़ने से ज्यादा सीधे मोर्चे पर जाकर लड़ने का वक़्त आ गया है। बीते दो दशक से हमारा परिवेश और जीवन कितना तेज़ी से बदला है कि हमसे कितनी ही सुखद अनुभूतियाँ पीछे छूट गयी। आपसदारी में कम होते प्रेमभाव पर चिंता करते गीत बहुत सराहे गए। एक बार यह भी लगा कि गायब होते गाँव की बीती खुशबू और ऊपर से जीवनचर्या में आया दोगलापन आज के आदमी की ख़ास विशेषता हो गया है। आखिर में गोष्ठी का संचालन करते हुए माणिक ने मम्मियां, एकलौती अच्छी ख़बर और वजूद शीर्षक से कवितायेँ पढ़ी। मार्मिक अंदाज़ में प्रस्तुत इन कविताओं में बच्चों को लाड करती मम्मियों का दुलार ,किसानों का पीड़ादायक जीवन और आम आदमी के लिए वजूद का संकट मुख्य विषय रहे  

रचनापाठ की शुरुआत में कवियों का डॉ.कनक जैन, संजय कोदली और डॉ.राजेश चौधरी ने माल्यार्पण द्वारा स्वागत किया। कवियों का परिचय हिंदी प्रशिक्षक जीतेन्द्र यादव ने दिया। आखिर में आभार अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन के चित्तौड़गढ़ समन्वयक मोहम्मद उमर ने दिया। उपस्थित श्रोताओं ने यथायोग्य श्रमदान भी किया।कार्यक्रम के सूत्रधार चित्तौड़गढ़ आर्ट सोसायटी के संयोजक युवा चित्रकार मुकेश शर्मा, आकाशवाणी कोम्पियर शाहबाज खान, स्पिक मैके कोषाध्यक्ष भगवती लाल सालवी, चित्तौड़ कॉलेज के निदेशक विनय शर्मा, अपनी माटी के संस्थापक सदस्य शेखर चंगेरिया थे
डॉ.राजेश चौधरी,अपनी माटी साथी 
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