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आँखें मूंदकर रचना संवेदनहीनता का परिचायक है।-डॉ सत्यनारायण

 (यथार्थपरक कविताओं से सार्थक हुयी अपनी माटी की संगोष्ठी)
चित्तौड़गढ़ 10 मार्च,2013

रचनाकार को अपने वैयक्तिक जीवन के साथ ही सामाजिक यथार्थ को ध्यान में रखकर रचनाएं गढ़ना चाहिए।जो लेखक सच और सामने आते हालातो को दरकिनार कर ग़र आज भी प्रकृति और प्यार में ही लिख रहा है तो ये समय और समाज कभी उसे माफ़ नहीं करेगा।वे तमाम शायर मरे ही माने जाए जो अपने वक़्त की बारीकियां  नहीं रच रहे हैं।इस पूरी प्रक्रिया में ये सबसे पहले ध्यान रहे कि कविता सबसे पहले कविता हो बाद में और कुछ।

ये विचार साहित्य और संस्कृति की ई-पत्रिका अपनी माटी के संरक्षक और हिंदी समालोचक डॉ सत्यनारायण व्यास ने नौ मार्च को चित्तौड़ में संपन्न कवि संगोष्ठी में व्यक्त किये।युवा समीक्षक डॉ कनक जैन के संचालन और गीतकार अब्दुल ज़ब्बार,वरिष्ठ कवि शिव मृदुल की अध्यक्षता में हुए इस आयोजन में नगर के चयनित कवियों ने प्रबुद्ध श्रोताओं के बीच कवितायेँ पढ़ी। संगोष्ठी की शुरुआत में नगर की लेखक बिरादरी में शामिल दो नए साथियों ने पहली बार रचनाएं पढ़ी। अरसे बाद किसी अनौपचारिक माहौल में हुए इस कार्यक्रम में प्रगतिशील युवा कवि विपुल शुक्ला ने पढ़ना, समय, सीमा, जैसी रचनाएं और कौटिल्य भट्ट 'सिफ़र' ने दो गज़लें पढ़कर वर्तमान दौर पर बहुतरफ़ा कटाक्ष किये।इससे ठीक पहले लोकगीतों की जानकार चंद्रकांता व्यास ने सरवती वन्दना सुनायी।

अपनी माटी संस्थापक माणिक ने हाशिये का जीवन जीते आदिवासियों पर केन्द्रित कविता आखिर कभी तो और व्यंग्य प्रधान कविता आप कुछ भी नहीं हैं  सुनायी।सुनायी जा रही कविताओं में यथासमय श्रोताओं ने भी अपनी समीक्षात्मक टिप्पणियाँ देकर संगोष्ठी को सार्थक बनाया।दूसरे दौर में डॉ रमेश मयंक ने अजन्मी बेटी के सवाल और आओ कल बनाएँ जैसे शीर्षक की कविताओं के बहाने जेंडर संवेदनशीलता और समकालीन राजनीति पर टिप्पणियाँ की।राजस्थानी गीतकार नंदकिशोर निर्झर ने कुछ मुक्तक पढ़ने के बाद आज़ादी के बाद के पैंसठ सालों को आज़ादी के पहले के सालों पर तुलनापरक कविता सुनायी जिसे बहुत सराहा गया।

राष्ट्रीय पहचान वाले मीठे गीतकार रमेश शर्मा ने अपना नया गीत मेरा पता सुनाकर हमारे देश में ही बसे दो तबकों के जीवन में मौलिक ढंग से झांकने और उसका विवरण देने की कोशिश की। गीतों में आयी नयी शब्दावली से उनके गंवई परिवेश की खुशबू हम तक आती है। इसी बीच अब्दुल ज़ब्बार ने अपने प्रतिनिधि शेर और एक गीत गरीब के साथ विधाता है पढ़ा । उनके चंद शेर 


बेकार वो कश्ती जो किनारा न दे सके
बेकार वो बस्ती जो भाईचारा न दे सके।
बेकार जवानी वो ज़ब्बार ज़हाँ में 
बुढापे में जो माँ -बाप को सहारा न दे सके।।
 -अब्दुल ज़ब्बार 

जब ज़िंदगी ही कम है मुहब्बत के वास्ते
लाऊँ कहाँ से वक़्त नफ़रत के वास्ते।
शराफत नाम रखने से शराफत कब मयस्यर है 
शराफत भी ज़रूरी है शराफत के वास्ते।।-अब्दुल ज़ब्बार

इस अवसर पर कविवर शिव मृदुल ने अपने कुछ मुक्तक,छंद और दोहे प्रस्तुत किये। आखिर में आम आदमी की पीड़ा विषयक कविता सुनायी। डॉ सत्यनारायण व्यास ने अपनी पहचान के विपरीत पहली बार दो गज़लें सुनायी।जिसके चंद शेर ये रहे कि 

जंगल में जैसे तेंदुआ बकरी को खा गया 

थी झोंपड़ी गरीब की बिल्डर चबा गया।

नज़रें गढ़ी थी और फिर मौक़ा मिला ज्यों ही 
बेवा के नन्हे खेत को ठाकुर दबा गया।


उन्होंने और फिर एक कविता तू वही  सुनायी जिसमें ज़िंदगी की सार्थक परिभाषाएं सामने आ सकी।इस असार संसार में उलझे बगैर हमें मानव जीवन के सार्थक होने का सोच करना चाहिए जैसा चिंतन निकल कर आया। अपनी माटी की इस संगोष्ठी में समीक्षक डॉ राजेश चौधरी, चिकित्सक डॉ महेश सनाढ्य, शिक्षाविद डॉ ए एल जैन, कोलेज प्राध्यापिका डॉ सुमित्रा चौधरी, कुसुम जैन, सरिता भट्ट, गिरिराज गिल, विकास अग्रवाल ने अपनी टिप्पणियों के साथ शिरकत की। आभार युवा विचारक डॉ रेणु व्यास ने व्यक्त किया।


रिपोर्ट:माणिक,चित्तौड़गढ़ 
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ई-पत्रिका 'अपनी माटी' का 24वाँ अंक प्रकाशित


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